Wednesday, 15 June 2016

शोले (Sholay) 1975


फ़िल्म शोले बॉलीवुड की सबसे लोकप्रिय फ़िल्म है। यूँ कहें कि बॉलीवुड फ़िल्म  इतिहास की सबसे अधिक मशहूर फ़िल्म है शोले।
15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई फ़िल्म शोले की शुरुआत तो कुछ ख़ास नही रही थी, लेकिन धीरे धीरे फ़िल्म को इतना अधिक पसंद किया जाने लगा कि इस फ़िल्म में लोकप्रियता के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर कई सारे नए रिकॉर्ड बनाये।

फ़िल्म शोले के निर्माता थे जी पी सिप्पी और निर्देशक रमेश सिप्पी। इस फ़िल्म में संगीत दिया था आर डी बर्मन ने। फ़िल्म में मुख्य किरदार निभाया था - अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, संजीव कुमार, हेमा मालिनी, जया बच्चन और अमजद खान ने। अमजद खान की यह पहली फ़िल्म थी। 

 फ़िल्म की कहानी -
एक गांव था जिसका नाम था रामगढ़। इस गांव में डाकू गब्बर सिंह (अमजद खान) का काफी आतंक था। गब्बर सिंह के आतंक को खत्म करने का बीड़ा उठाया वहीँ के पुलिस इन्स्पेक्टर ठाकुर बलदेव सिंह (संजीव कपूर) ने। इन्स्पेक्टर ठाकुर बलदेव सिंह गब्बर सिंह को गिरफ्तार कर लेते हैं। अदालत डाकू गब्बर सिंह को कठोर सजा सुनाती है।किन्तु गब्बर सिंह ठाकुर बलदेव सिंह से बदला लेने की कसम खाता है। गब्बर जेल चला जाता है। तब इन्स्पेक्टर ठाकुर बलदेव सिंह अपनी ड्यूटी से छुट्टी ले कर अपने गांव आता है। लेकिन उनके गांव पहुँचने से पहले ही डाक गब्बर सिंह जेल से फरार हो जाता है और ठाकुर बलदेव सिंह के घर पहुँच कर ठाकुर के परिवार के सभी लोगों की निर्मम हत्या कर देता है। इस हत्याकांड में ठाकुर बलदेव सिंह की नई नवेली बहु राधा (जया बच्चन) किसी तरह बच जाती है लेकिन उसका पति मारा जाता है। जब ठाकुर बलदेव सिंह अपने घर पहुँचता है तो घर पर अपने परिवार की लाश देख कर बौखला उठता है और गब्बर सिंह की तलाश में निकलता है। लेकिन गब्बर सिंह जल्द ही ठाकुर बलदेव सिंह को घेर लेता है और ठाकुर के दोनों हाथ काट देता है। फिर गब्बर सिंह अपराध की दुनिया में दोबारा लौट आता है। ठाकुर बलदेव सिंह गब्बर सिंह को कानून के हवाले करने की सौगंध खाता है।
ठाकुर साहब गब्बर सिंह जैसे खूंखार डाकू को पकड़ने के लिए दिलेर और निडर युवा की खोज करता है। और इसी क्रम में वो दो मशहूर चोर जय (अमिताभ बच्चन) और वीरू (धर्मेन्द्र) के पास जेल में पहुँचते है। जय और वीरू एक दूसरे के जिगरी दोस्त हैं और साथ ही साथ किसी भी खतरनाक मिशन को पूरा करने से डरते नहीं हैं। इनदोनों की दिलेरी से ठाकुर बलदेव सिंह काफी प्रभावित हुए थे जब इनदोनों ने एक बार एक ट्रेन डकैती के दौरान डकैतों का जम के मुकाबला किया था और घायल इन्स्पेक्टर ठाकुर बलदेव सिंह की जान बचाई थी।
जेल में ठाकुर बलदेव सिंह जय और वीरू से गब्बर सिंह को पकड़वाने में मदद करने के एवज में उन दोनों को जेल से रिहा करवाने का सौदा करने का ऑफर देते हैं। पहले तो जय और वीरू गब्बर सिंह से पंगा लेने की बात स्वीकार नहीं करते लेकिन जब ठाकुर साहब उन दोनों को धन का लालच देते हैं तो दोनों ऑफर स्वीकार कर लेते हैं।
उसके बाद जय और वीरू रामगढ़ पहुँचते हैं जहाँ सबसे पहले उनदोनो की मुलाक़ात एक तांगेवाली बसंती (हेमा मालिनी) से होती है। बातों ही बातों में वीरू बसंती को अपना दिल दे बैठता है। बसन्ती भी रामगढ़ में ही अपनी मौसी (लीला मिश्रा) के साथ रहती है। मौसी को बसन्ती की शादी की बड़ी फ़िक्र लगी रहती है। वीरू बसन्ती के साथ अपने विवाह का प्रस्ताव मौसी के पास भिजवाता है लेकिन पहले तो मौसी इनकार कर देती है लेकिन जब वीरू पानी की एक टँकी पर चढ़ कर आत्महत्या करने की नौटँकी करता है तो बेचारी मौसी मजबूर हो कर बसन्ती की शादी वीरू के साथ करने को राजी हो जाती है।
उधर जय भी ठाकुर साहब की विधवा बहु राधा को मन ही मन पसंद करने लगता है किन्तु खुल कर किसी से अपने दिल की बात नहीं बताता।
तभी गब्बर सिंह के तीन आदमी रामगढ़ के लोगों से रंगदारी के रूप में अनाज और धन की वसूली करने आते हैं। लेकिन जय और वीरू उन तीनो को जम कर पीटते हैं और भगा देते हैं। जय और वीरू की इस बहादुरी पर गांव वाले काफी खुश होते हैं। लेकिन गब्बर सिंह बौखला जाता है।
वो जय और वीरू को सबक सिखाने का फैसला करता है और खुद रामगढ़ पहुंच जाता है। लेकिन जय और वीरू ने पुरे गांव वालों को इस तरह तैयार कर दिया था कि सब ने मिल कर गब्बर सिंह का डट कर मुकाबला किया जिससे घबरा कर गब्बर सिंह भागने को मजबूर हो गया। लेकिन अपने ऊपर हुए हमले से गब्बर सिंह और भी अधिक क्रोधित हो गया। 
उसने रामगढ़ के लोगों पर जय और वीरू को गांव से बाहर करने का दवाब बनाने के लिए गांव के बूढ़े व नेत्रहीन इमाम (ए के हंगल) के युवा बेटे (सचिन) की हत्या कर उसकी लाश को घोड़े पर लाद कर रामगढ़ भेज देता है।
इससे रामगढ़ के लोगों में दहशत छा जाती है और वो लोग जय और वीरू को गांव छोड़ने को कहते हैं। हालांकि ठाकुर साहब गांव वालों के इस फैसले से नाराज भी होते हैं लेकिन वो भी लाचार हो जाते हैं। 
तभी डाकू गब्बर सिंह के आदमी वीरू और बसन्ती का अपहरण कर अपने अड्डे पर ले आते हैं। वो लोग जय का इन्तजार कर रहे होते हैं। तभी जय अकेला वहां आ जाता है और वीरू व बसन्ती को गब्बर के चंगुल से आजाद करवाता है। जय वीरू और बसन्ती को रामगढ़ से और आदमी व हथियार लाने भेजता है व खुद गब्बर के खिलाफ मोर्चा संभाले रखता है।
जब तक वीरू रामगढ़ से वापस आता है तब तक जय घायल हो कर अंतिम सांस ले रहा होता है। जय वीरू की बांह में दम तोड़ देता है। 
अपने दोस्त की मौत से वीरू एकदम बौखला उठता है और खुद ही गब्बर सिंह के गैंग पर टूट पड़ता है।आखिरकार गब्बर सिंह वीरू की पकड़ में आ जाता है। वीरू अपने दोस्त जय की हत्या का बदला गब्बर की हत्या कर के लेने पर उतारू हो जाता है लेकिन एन मौके पर ठाकुर साहब वहाँ पहुंच कर वीरू को उसका वायदा याद दिलाते हैं कि गब्बर को कानून के हवाले करने की बात हुई थी ना कि मारने की। पहले तो वीरू किसी भी वायदे को निभाने से इनकार कर देता है लेकिन ठाकुर साहब की जिद के कारण अंततः गब्बर सिंह को वीरू पुलिस के हवाले कर देता है। इस तरह फ़िल्म जय की मृत्यु के दुखद अंत के साथ समाप्त हो जाती है।

समीक्षा -
फ़िल्म की कहानी और पटकथा काफी बेहतरीन हैं। यह फ़िल्म कला और व्यावसायिक दोनों का एक खूबसूरत मिश्रण है। सभी कलाकारों ने जबरदस्त अभिनय किया है। इस फ़िल्म के गाने भी काफी मशहूर हैं। गब्बर सिंह का चरित्र को अमजद खान ने अपने बेहतरीन अभिनय से अमरत्व प्रदान कर दिया है।फ़िल्म की खासियत ये भी है कि छोटे रोल के लिए भी बेहतरीन अभिनेताओं को लिया गया ना कि किसी जूनियर कलाकार को। यही वजह है कि हर चरित्र को काफी बेहतरीन तरीके से निभाया इन बड़े कलाकारों ने। 
बॉलीवुड को समझने के लिए इस फ़िल्म को देखना अत्यंत ही आवश्यक है। 

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